Sunday, March 17, 2013

जगदीश की रिपोर्ट :: जनसंचार और राजनीति

जनसंचार और राजनीति
जनसंचार और राजनीति के बीच वैसा ही घनिष्ट सम्बन्ध है, जैसा की व्यक्ति और समाज के बीच होता है. राजनेताओ और राजनितिक निर्णयों, शासकीय क्रिया कलापों, न्यायिक प्रक्रिया
 , सरकारी नीतियों, विकास कार्यो आदि के बारे में जानकारी जनसंचार मध्यमो को आम आदमी तक पहुचाते है. सरकार के सही निर्णयों और नीतियों को उचित परिपेक्ष  में रखना और उसके जनविरोधी निर्णयों का पर्दाफाश करना जनसंचार माध्यमो का उतरदायित्व है. इससे सरकार को अपनी खूबियों और खामियों को समझने और आवश्यकतानुसार उनमे फेरबदल करने का अवसर मिलता है.

जनसंचार माध्यम न हो तो राजनीति प्रभा-विहीन हो जाएगी और अगर राजनीति न हो, तो जनसंचार माध्यम निष्प्राण से हो जायेगे. राजनेता चाहते है की उनका बयान और उनके निर्णय बिना विलंब जन जन तक पहुचे, क्योकि उसके लिए हर व्यक्ति के पास जाकर अपनी बात कहना सम्भव नहीं हो पाता है. जनसंचार माध्यम उसकी आवाज़ को बिना विलम्ब जन जन पंहुचा देते है। राजनेता और राजनीतिक दल प्रचार चाहते है, जनसंचार माध्यम उनकी इस इच्छा की पूर्ति करते है।
राजनीति में समाचार पत्रों का बड़ा महत्व है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरु को समाचारपत्रों की आज़ादी का बहुत बड़ा हिमायती माना जाता था। उन्होंने कांग्रेस के मुख पत्र नेशनल हेराल्ड के तत्कालीन संपादक स्वर्गीय चलपति राव की प्रतिष्ठा बनाये रखने की खातिर कई बार उनकी बात मानी। श्री नेहरु का मानना था की समाचारपत्रों के ना  होने से बेहतर है, ख़राब समाचारपत्रों का होना. नेहरु काल में समाचारपत्रों पर सेंसरशिप लगाए जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी .


राजनीति में जनसंचार का वही महत्व है, जो देह में जीव का है। जिस तरह जीव विहीन देह की कल्पना नहीं की जा सकती है, उसी तरह जनसंचार विहीन राजनीति  निर्जीव लगती है। राजनीति की सारी चमक दमक का दारोमदार जनसंचार माध्यमो पर होता है। जनसंचार माध्यम ही लोगो को सरकार  के अच्छे बुरे दोनों ही तरह के कार्यो से अवगत कराते है। स्वाधीनता के बाद से लेकर आज तक राजनेताओ ने जो छोटे बड़े घोटाले किये उनकी जानकारी जनसंचार माध्यमो ने ही लोगो तक पहुचाई। अगर जनसंचार माध्यम न होते तो यह सारे  घोटाले सरकारी फाईलों में ही दफ़न हो कर रह जाते.